मेरी माँ अपने झगड़ों का बोझ और रोज़ाना की अपनी बेइज़्ज़ती का सारा ग़ुस्सा मेरे भाई और मुझ पर उतारती थीं। अकेले हम ही उनका सुरक्षित आसरा थे। पहले से ही ख़राब उनका मिज़ाज, अब और बेतुका और बेक़ाबू हो गया। वह किस बात पर ग़ुस्सा हो जाएँगी और किस बात पर ख़ुश, यह अन्दाज़ लगाना या तय कर पाना मेरे लिए असम्भव हो गया। बारूदी सुरंग वाले उस इलाक़े से गुज़रने के लिए मुझे नक़्शे के बिना ही अपना रास्ता खोजना पड़ता था। अक्सर मेरे पाँव और उँगलियाँ और कभी-कभी तो मेरी खोपड़ी भी उड़ जाती, मगर कुछ देर हवा में तैरते रहने के बाद, जादुई तरीक़े से वे फिर अपनी जगह लौट आते।
जब वह मुझसे ग़ुस्सा होतीं, तो मेरे बोलने के तरीक़े की नक़ल उतारा करती थीं। वह बढ़िया नक़्क़ाल थीं और ऐसी नक़ल करतीं कि मैं ख़ुद को उपहास लायक़ ही मान बैठती। मुझे ऐसे हर मौक़े की हर चीज़ साफ़-साफ़ याद है। यहाँ तक कि यह भी कि तब मैंने क्या पहन रखा था। ऐसा लगता था कि जैसे तेज़ धार वाली कैंची से उन्होंने मुझे तसवीरों की किसी किताब से काटकर निकाला हो – मेरी काया गढ़ी हो – और फिर मुझे चिन्दी-चिन्दी कर डाला हो।
पहली बार ऐसा तब हुआ, जब दो हफ़्ते मद्रास में रहने के बाद हम घर लौट रहे थे। अपने पति के साथ छुट्टियाँ बिताने बाहर जा रही उनकी बड़ी बहन, मिसेज़ जोसेफ़ ने पूछा था कि क्या इस दौरान वह उनके तीनों बच्चों की देखभाल कर सकती हैं। (वही मिसेज़ जोसेफ़, सालों बाद मैंने दिल्ली में ऑटो-रिक्शा ड्राइवर से जिनके घर ले जाने के लिए कहा था।) मेरी माँ तैयार हो गईं। उनको लगा होगा कि वहाँ रहकर, बराए-नाम ही सही, उनकी थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाएगी।
आयमनम के झगड़ालू आलमी बाशिंदों से उलट, मिसेज़ जोसेफ़ के पास एक अदद पति, जो इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे, सलीक़ेदार बच्चे और बाक़ायदा नौकरों वाला एक घर था। मिसेज़ जोसेफ़ को इस बात का पूरा एहसास था कि ऐसे दुनियावी मामलों में वह कामयाब रहीं, जिनमें उनके भाई-बहन नाकाम हो गए थे। वह आकर्षक थीं, उनकी ऊँची और आत्मतुष्ट आवाज़, उनकी कड़क, इस्त्री की हुई साड़ियाँ और उनके क़रीने से बने हुए बालों से मेल खाती थी। होंठ दबाकर वह ऐसे मुस्कुरातीं जैसे सब कुछ जानती हों और जब किसी से बात करतीं तो हमेशा ऐसा लगता जैसे उसे राज़ की कोई बात बता रही हों। उनमें और मेरी माँ में कोई साम्य नहीं था, न तो जिस्मानी और न ही ज़ेहनी तौर पर।
मिसेज़ जोसेफ़ जब छुट्टी मनाकर लौटीं, तो दोनों बहनों में किसी बात को लेकर ज़बरदस्त झगड़ा हुआ। अगले रोज़ हम हवाई जहाज़ से केरल लौट आए। मेरी मौसी के पायलट पति के पास मुफ़्त टिकटों का कोटा था।
इसके पहले हम कभी हवाई जहाज में नहीं बैठे थे। जब हम बैठ गए, तो जहाज़ के हम-सफ़र मुसाफ़िरों की तरह समझदारी-भरी, कुछ गम्भीर चर्चा के इरादे से मैंने अपनी माँ से पूछ लिया कि मिसेज़ जोसेफ़ अगर उनकी सगी बहन हैं, तो फिर वे इतनी छरहरी कैसे हैं? मेरी माँ ने ग़ुस्से से तमक कर मेरी ओर देखा और मेरी नक़ल करने लगीं। मुझे महसूस हुआ कि अपनी ही देह के भीतर सिकुड़कर मैं बहती जा रही हूँ, किसी सिंक में चक्कर खाकर बहते हुए पानी की तरह, जब तक कि पूरी तरह ग़ायब नहीं हो गई। फिर उन्होंने कहा, “तुम जब मेरी उम्र की होगी, तो डील-डौल में मुझसे तीन गुना हो जाओगी।” मैं यह तो समझ गई कि मैंने कोई बहुत ख़राब बात कह दी है, पर यह नहीं समझ पाई कि क्या। (‘मोटा’ और ‘दुबला’ के बारे में सही-ग़लत समझने के लिहाज़ से मैं बहुत छोटी थी।) वह तो सालों के बाद, जब यह वाक़या मेरे ज़ेहन में गूँज रहा था, जैसा कि अक्सर होता है, और जब मैंने अपने जज़्बात में उलझे बिना इसके बारे में साफ़-साफ़ सोचा, तब आख़िरकार मुझे यह एहसास हुआ कि मैंने जो कहा था वह कितना तकलीफ़देह रहा होगा।
मेरी माँ जो स्टेरॉयड ले रही थीं, उसकी वजह से उनका वज़न अचानक बढ़ गया था। उनका चेहरा फूल कर पूर्णिमा के चाँद की तरह गोल हो गया था। तीखे नैन-नक्श वाला उनका ख़ूबसूरत चेहरा फूले हुए गालों और दोहरी ठुड्डी के पीछे छिप गया था। अपनी छरहरी बहन के आलीशान घर से लौटने के बाद वह अकेलापन और उदासी महसूस कर रही होंगी। उनकी कामयाब ज़िन्दगी का सफ़र शुरू होना अभी बाक़ी था, मगर तब इसके कोई आसार दिखाई नहीं देते थे। (समय के साथ उन्होंने अपनी काया के बदलावों को क़बूल कर लिया। और अपने स्कूल की लड़कियों को भी यही सिखाया। पचास पार की उम्र में उन्होंने स्कूल में एक फ़ैशन शो के लिए ‘बेदिंग सूट’ पहना और बच्चों को रैंप पर लचककर चलने का सलीक़ा सिखाया।) उनसे उनकी छरहरी बहन के बारे में मेरा सवाल खुले ज़ख़्म पर नमक छिड़कने जैसा लगा होगा। लापरवाह बच्चे के लापरवाही-भरे अल्फ़ाज़। जिससे वह मुझ पर भड़क गईं और छह साल की उम्र के मेरे बोलने के तरीक़े की नक़ल करने लगीं। और मैं ख़ुद पर भड़क उठी। मुझे जहाज़ के भीतर की हवा याद है – जो वहाँ थी ही नहीं। मुझे अपनी पोशाक का रंग याद है। गोल-गोल बिंदियों वाली आसमानी नीले रंग की पोशाक। सीधे बालों और हिरणी जैसी बड़ी-बड़ी आँखों वाली मेरी बा-सलीक़ा मौसेरी बहन की पहनी हुई बा-सलीक़ा पोशाक। मैंने देखा कि वह पोशाक मेरे घुटनों से मेल नहीं खाती थी, जिन पर खरोंचों और चोटों के बेशुमार निशान थे – जो आयमनम में मीनाचिल नदी के किनारे मेरी उच्छृंखल, आधी-अधूरी, बिना पिता और बिना पायलट वाली ज़िन्दगी का विस्तृत रोज़नामचा थे। अपनी बा-सलीक़ा मौसेरी बहन के साथ मैंने एक काल्पनिक मुक़ाबला रखा, जिसमें मैं आसानी से जीत गई। उसके पिता पायलट थे। और उसके बाल बहुत सुन्दर थे। लेकिन मेरे पास हरे रंग की एक नदी थी। (जिसमें मछलियाँ थीं, जिसमें आसमान और पेड़ समाये हुए थे और रात में टूटा हुआ पीला चाँद झाँकता था।) और एक गिलहरी भी थी। मैंने अपने पैरों की तरफ़ देखा और पाया कि उनका उन सैंडिलों से कोई वास्ता नहीं था जो उन्होंने पहन रखे थे।
यह ख़ौफ़नाक लोगों से भरा हुआ ख़ौफ़नाक जहाज़ था, जो एक ख़ौफ़नाक आसमान में उड़ रहा था। मैं चाहती थी कि वह किसी हादसे का शिकार हो जाए और हम सब मारे जाएँ। मुझे ख़ासकर बहुत दुलराने वाले माँ-बाप के बिगड़ैल बच्चों से नफ़रत थी। मैं सामूहिक सज़ा के हक़ में थी। मगर थोड़ी देर बाद मेरी माँ ने कहा, “मैं तुम्हारी माँ और बाप दोनों हूँ और मैं तुम्हें दोगुना प्यार करती हूँ।”
और उसके बाद जहाज़ में सब कुछ ठीक हो गया। आसमान भी अच्छा लगने लगा। मगर मेरे पहने हुए सैंडलों में मेरे पाँव अब भी अजनबी लग रहे थे। और इसके अलावा कुछ मुद्दे अब भी अनसुलझे थे :
उनके मुक़ाबले अगर मैं तीन गुना हो गई, तो अपने बैठने के लिए मुझे तीन सीटों की ज़रूरत होगी। यानी, तीन फ़्री टिकट।
दोगुना। तिगुना। गणित की एक क्लास। हल करने के लिए एक सवाल।
दोगुना प्यार को अगर मेरी तीन गुना काया से भाग देकर, फ़्री टिकटों से गुणा करें, और फिर लापरवाह शब्दों से भाग कर दें तो हासिल क्या होगा? एक दहशतज़दा दिल पर एक सर्द, रोएँदार पतंगा। वह पतंगा मेरा वफ़ादार साथी था।
मैंने बचपन में ही सीख लिया था कि सबसे सुरक्षित जगह सबसे ख़तरनाक हो सकती है। और अगर ऐसा न भी हो, तो मैं उसे ऐसा बना डालती हूँ।
सालों बाद, जब मैं तीस साल की हो चुकी थी, एक सयानी औरत और एक उपन्यासकार, मैं अपने एक दोस्त के यहाँ गई, जिसकी अभी-अभी शादी हुई थी। वह ख़ुशहाल जोड़ा कई दिनों तक, पूरे-पूरे दिन, एक-दूसरे से गूटर-गूँ करता और बच्चों की तरह बतियाता रहता। तीसरे दिन, मैं लगभग भागती हुई उनके घर से निकल आई और दौड़ती हुई मोटरों की भीड़ में जा पहुँची। पता नहीं किस बात ने मुझे इतना परेशान कर दिया था। यह तो अभी, जब मैं यह लिख रही हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं समझ गई हूँ। उन्होंने कुछ भी बुरा नहीं किया था – वजह तो ख़ुद मैं ही थी। मेरा पुराना दोस्त, वह सर्द पतंगा, अचानक मुझसे मिलने आ गया था।
(फिर भी, तुतलाकर बातें करने वाले बालिग़ अगर एक वैधानिक चेतावनी के साथ मिलें तो मेरे जैसे लोगों को बड़ा चैन मिलेगा।)

Meri Maa Meri Gangster, Arundhati Roy, translated from English by Prabhat Singh, Rajkamal Prakashani.